Posts

ભક્તીમાંલા નાં ૧૦૮ મોતી ...price-3 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश .... ભક્તિમાળાના ૧૦૮ મોતી ભગવાનની પ્રસન્નતા એના પર જ હોય છે, જે બુદ્ધિને ઓછું અને હૃદયને વધુ મહત્ત્વ આપે છે, અહંકારી વ્યક્તિ એમના દેહાધ્યાસમાં જ રહી જાય છે. મૃત્યુ ભલભલાનાં દેહાધ્યાસને ચકનાચૂર કરી દે છે, જયારે ભક્તો પોતાને ભગવાનને સમર્પિત કરીને મૃત્યુનું અતિક્રમણ કરીને આ લોક અને પરલોકને પણ સુધારી લે છે. સંસાર તમારી તરફ (સામે) કેવો દૃષ્ટિકોણ રાખે છે, એની પરવાહ કર્યા વગર ભગવાનની પ્રસન્નતા છે કે નહીં એ વિચારવું અને એને પ્રાપ્ત કરવાનો પ્રયત્ન કરવો એ વધારે શ્રેયસ્કર છે. એ વિચારો કે તમે તમારા આચરણ અને તમારા કર્મથી કેટલાં ને ભગવાનની તરફ વળ્યાં ?

yogam dhyanam... price- 20 Rs/- ( only digital copy available)

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... हम सभी सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जीना चाहते हैं । किंतु पढ़ाई, नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण हम दिनभर भागदौड़ करते रहते हैं । परिणाम स्वरुप हमें प्राप्त होता है, शारीरिक रोग एवं मानसिक अशांति । अतः हम आपके लिए एक अनुपम उपहार लेकर उपस्थित हुए हैं, जिसका नाम है ‘ योगम् - ध्यानम् ... ( संकीर्तन - तलियोग ) ।’ योग एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर , मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का कार्य होता है । लोगों को आमतौर पर लगता है कि योग व्यायाम का एक रूप है जिसमें शरीर के हिस्सों को हिलाना-डुलाना शामिल है, लेकिन योग व्यायाम से बढ़कर है । योग मानसिक , आध्यात्मिक और शारीरिक पथ के माध्यम से जीवन जीने की कला है । यह स्थिरता प्राप्त करने और आंतरिक आत्मा की चेतना की गहराई में उतरने के लिए सहायता करता है । हमारा मन केवल भावनाओं और शारीरिक आवश्यकताओं के बारे में ज्यादा न सोचे और दिन-प्रतिदिन जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करे ? यह सीखने में भी योग मदद करता है । योग शरीर , मन और ऊर्जा के स्तर पर काम करता है । योग का नियमित अभ्यास शरीर में सकार...

matru - pitru devo bhavah ...price-2 RS/- ( marathi)

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ...  जरा विचार करा... २८ विकसित देशांमध्ये ·          दरवर्षी अवध्या १३ ते १९ वर्षाच्या वयोगटात गर्भवती होणाऱ्या कुमारिका -१२,५०,००० ·          त्यांपैकी दरवर्षी गर्भपात करविणाऱ्या कुमारिका ५,००,००० ·          बाकीच्या कुमारी माता बनून सरकार व आई-वडिलांवर ओझे बनणाऱ्या, वेश्यावृत्ती धारण करणाऱ्या कुमारिका - ७,५०,००० (इन्नोसंटी रिपोर्ट कार्डनुसार) ‘व्हेलेंटाइन डे ’ चा दुष्परिणाम   काय तुम्हाला वाटते कि आपल्या देशाची बाल व तरुण पिढी विका री आकर्षणे, अश्लीलता आणि व्यसनांमध्ये गुरफटून विकृत मानसिकतेची व्हावी तसेच व्याधी, तणाव आणि चिंताग्रस्त होऊन तिचा सत्यानाश व्हावा ? आपल्या देशातही संतती असूनही आई-वडिलांनी निराधार होऊन वृद्धाश्रमांमध्ये पडून रहावेत ? चला तर साजरा करूया... १४ फेब्रुवारी मातृ-पितृ पूजन दिवस... कारण प्रेम तर पवित्र असते... १४ फेब्रु वा रीला मुले-मुली एकमेकांना फूल देतात. एकमेकांना फुल देणे, ‘म...

jyot se jyot jalao .... price- 15 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश . .. अधिकतम संसार आँखों से व कानों से प्रविष्ट होता है | जितना संसार का दर्शन, श्रवण कम होगा उतना ही संसार का आकर्षण कम होता जाएगा और जितना अधिक भगवान का चिंतन, स्मरण होगा उतना भगवान हमारे भीतर प्रविष्ट होते जाएँगे | संसार में रहें लेकिन संसार के रूप में जो इश्वर है, उसी इश्वर की सर्वत्र-सर्वदा और सर्वथा कृपा का दर्शन करें | यदि हर परिस्थिति ईश्वर द्वारा भेजी हुई लगने लगे तो फिर संसार संसार नहीं रह जाता, वह फिर प्रभु का विलास हो जाता है | फिर उसे हर परिस्थिति में शांति, आनंद और माधुर्य मिलने लगता है और वह स्वयं मुक्त स्वरुप हो जाता है | जो आत्मा में ही रत सदा, आत्मा में संतृप्त है | आत्मा में ही मग्न है, आत्मा से संतुष्ट है | आस्था सभी की त्यागकर निर्वासना सो धीर है, जीता हुआ सो मुक्त है, सशरीर भी अशरीर है |

jansankhya vruddhi - price-10 Rs/- ( only digital copy available )

Image
पुस्तक के कुछ अंश ... मनुष्य के पास केवल पेट ही नहीं होता, बल्कि दो हाथ, दो पैर और एक मस्तिष्क भी होता है, जिनसे वह केवल अपना ही नहीं, बल्कि कई प्राणियों का भरण-पोषण कर सकता है | फिर जनसंख्या वृद्धि की चिंता क्यों ? उत्पादन तो बढ़ाना चाहते हैं पर उत्पादक शक्ति (जनसंख्या) का ह्रास कर रहे हैं – यह कैसी बुद्धिमानी है ? एक-दो संतान होगी तो घर का काम ही पूरा नहीं होगा, फिर समाज का काम कौन करेगा? खेती कौन करेगा ? सेना में कौन भरती होगा ? सच्चा मार्ग बतानेवाला साधू कौन बनेगा ? बूढ़े माँ-बाप की सेवा कौन करेगा ? जन्म पर तो नियंत्रण, पर मौत पर नियंत्रण नहीं – यह कैसी बुद्धिमानी ? जो मृत्यु पर नियंत्रण नहीं रख सकता, उसको जन्म पर भी नियंत्रण रखने का अधिकार नहीं है |

દાનમ કેવલમ ... price-2 Rs/- (ગુજરાતી પુસ્તક)

Image
પુસ્તકોના સારાંશ .... આજની દિનચર્યામાં મનુષ્યો માટે સુખ-શાંતિ એક કલ્પના જ રહી ગઈ છે. તમે સ્વભાવિક રીતે મહેનત કાર્ય વગર આત્મ-સંતોષ મેળવવા માંગતા હો તો તેના માટે માનવતા અને કરુણાથી ભરેલાં હૃદયની જરૂરિયાત છે, પોતાના માટે પણ અને વિશ્વશાંતિ માટે પણ. તેથી તમે તમારી દિનચર્યામાં નીચે બતાવેલ સત્કર્મ જોડી લો. જો બધા ન કરી શકો તો બે તો અવશ્ય કરો. જીવમાત્ર પ્રતિ દયા અને મદદની ભાવના સાથે:- ૧) ગૌ માતાની સેવા – ગૌ માતા માટે રોટલી અને પાણીની કુંડીની વ્યવસ્થા. ૨) પક્ષીઓની સેવા – પક્ષીઓ માટે દાણા અને પાણીની કુંડીની વ્યવસ્થા. ૩) દરિદ્રનારાયણની સેવા – દરિદ્રનારાયણને રોજ ભોજન કરાવવું,નહી તો કોઈ એક ગરીબ પરિવારને ભોજન સામગ્રી આપવી. ૪) અસંગ્રહી બનવું –આપણી પાસે ઘરમાં જે સામાન વધારે હોય અથવા કામ વિનાનો હોય જેમકે જૂનાં કપડાં,ચંપલ, બુટ,વાસણ વગેરે જે બીજાના કામમાં આવે તેવી વસ્તુઓનું દાન કરો. અતિ સંગ્રહનો ત્યાગ કરવો.

bhagwaan kaun ....price- 10 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ........... ऋषियों की उद्घोषणा हमारे ऋषि-महर्षियों को जब ऐसी दिव्यतम अनुभूतियाँ हुई तो वे बोल उठे – हे विश्व के अमृत पुत्रों, सुनो ! हमने उस अमर तत्त्व को जान लिया है | आप भी उसी तत्त्व को जान लो | यह उपनिषद् के ऋषियों की घोषणा है | यही घोषणा श्रीकृष्ण ने की है | हे अर्जुन ! जो मैं हूँ वही तू है | फर्क इतना है कि तू जानता नहीं है, तुझे स्मरण नहीं है और मैं जानता हूँ | इस अनुभूति के लिए योग कर – तस्माद्योगी भवार्जुन : (गीता अ.६/४६) भगवद्तत्त्व को जानकार मनुष्य भी भगवत् स्वरुप हो जाता है, इसलिए ऋषियों ने यह घोषणा कर दी कि ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ यानी ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और वह ब्रह्म कोई एक देशीय नहीं होता |

be kind to critics...price-3 rs/-

Image
is pustak ke kuchh ansh :-  If someone criticizes you, neither get angy at him. Rather wish well for him and pray that he attains enough wisdom to make fruitful use of his time. Let criticism and humiliation not perturb you. Wish well for your critics, be kind to them. Take criticism in your stride thinking that without applying any special efforts, you are becoming a source of happiness and contentment for your critics. Be happy by seeing them happy. Keep your inner joy intact. Pray that your critics quickly get rid of their vices and nurture virtues to lead a prosperous life.

jaag jaag re jaag............price-5 Rs/- or 7 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... अपना ज्ञान प्रदान करो, अपनी कृपा प्रदान करो | ” यह उनकी कृपा ही है कि उन्होंने मानव तन दिया, फिर विवेक दिया, फिर सत्संग दिया, संतों का दर्शन दिया, सेवा का भाव दिया, अच्छा परिवार दिया, श्रद्धा-भक्ति-विश्वास दिया, अपने चरणों में प्रेम दिया | सचमुच बड़े ही भाग्यशाली हैं, नसीबाँवाले हैं हम, कि उस ईश्वर ने हमें इस योग्य समझकर इतना-इतना दिया ! बस यही प्रार्थना है कि उसका नाम न छूटे, भक्ति-सेवा न छूटे | स्वर्ग से सुंदर, सपनों से प्यारा, है तेरा दरबार ! हम को हर पल याद रहे, हे सांई ! तुम्हारा प्यार !! सांई तेरा प्यार न छूटे | गुरु दरबार न छूटे | ब्रह्मज्ञान की जीवन में अति आवश्यकता दुर्लभ मानव-तन में सिर्फ रोटी, कपडा, मकान और परिवार पाकर संतुष्ट हो जाना-यह मूर्खता है | “ आहार निद्रा भयमैथुन्म च सामान्यमेतदपशुभिर्नारायणाम् | ” आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये चार तो पशुओं में भी देखे जाते हैं – मनुष्य इन चार से अधिक आगे न बढ़े तो पशु में और इसमें क्या फर्क ? तीन चीजों को दुर्लभ बताया –...

jivan ki safalta ka rahasya....price- 10 Rs/- ( only digital copy available )

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... जीवन में सफलता का रहस्य आखिरकार , सफलता की राह क्या है ? पूर्ण सुखी होने का उपाय क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है - ये महत्वपूर्ण विषय कहे जाने वाले बड़े - बड़े धनवान , विद्वान , पदवान , लोग भी समझ नहीं पाते - कितना आश्चर्य है ! जो लोग यह समझते हैं कि धन मिल जाने से सुख मिलेगा तो सारे धनवान सुखी होते ! जो लोग यह समझते है कि ऊँचे पद पर पहुँच जाने पर सुख मिलेगा तो वे भी मूर्ख हैं क्योंकि ऊँचे पदों पर पहुँचने वाले भी दु : खी पाये गए है । सभी कुछ है - धन , संपत्ति , गाड़ी – मोटर, ऐशो - आराम के सारे साधन फिर भी अपूर्णता है जो कोस रही है - कुरेद रही है भीतर ही भीतर दीमक की नाई सबको खोखला बनाने के लिए लगी हुई है और इसी से बचने के लिए पूरी ताकत के साथ इंसान लगा है कि पूर्ण बन जाऊँ ।

sansaar sadhna ki prayogshala....Price- 10 Rs/- ( only digital copy available )

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... संसार : साधना की प्रयोगशाला ये संसार क्या है ? कोई कहता संसार झंझट है । किसीने कहा – दु:खों की खान है । कोई कहता है अशांति का घर है । तो किसीने कहा कि संसार धर्मशाला है । मैं कहता हूँ संसार साधना की प्रयोगशाला है । मनुष्य ही मनुष्य का वैरी बन गया है । जिस धरती पर पैदा हुआ उसी धरती को - उसी दुनिया को बिगाड़ने पर तुला है । और अपने को समझदार मान रहा है । संसार एक सबसे बड़ी प्रयोगशाला है । इस प्रयोगशाला में साधना के प्रयोग चल रहे हैं परंतु अफ़सोस इस बात का है कि जिन्होंने सफल सार्थक जीवन जीने के प्रयोग किये और सफल हुए - उनकी की हुई साधना को अपनानेवाले साधक विरले ही हैं । अक्सर गलत साधनाएं या अनावश्यक साधनाएं बढ़ गई हैं ।

daanam kevlam kaliyuge.... Price-1 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... दान महिमा करें प्राणीमात्र की सेवा , पाएँ सुख - समृद्धि का मेवा अगर हम गौर करें तो हमें पता चलेगा कि हमारे आस - पास की प्रकृति माता सतत देने का कार्य कर रही है । पीने के लिए पानी , साँसों के लिए हवा , सूर्य की किरणें आदि हमें बिना मोल ही मिलते हैं । परमात्मा एवं प्रकृति सतत प्राणीमात्र की सेवा में रत हैं । प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पर्यावरण की दृष्टि से हर प्राणी कुछ - न - कुछ योगदान देता ही है , जैसे बिल्ली चूहों को मारकर चूहों की वृद्धि संतुलित करती है । गाय के गोबर और मूत्र से पर्यावरण शुद्ध होता है । और तो और कोई भी प्राकृतिक आपदा आनेवाली होती है तो पशु - पक्षियों को उसका पहले संकेत मिल जाता है और उनके द्वारा मनुष्यों को भी संकेत मिल जाता है । आदान प्रदान की इस प्रकिया में क्या मनुष्य का यह कर्त्तव्य नहीं बनता कि वो भी प्राकृति के इस सेवाकार्य में कुछ योगदान दे याइन मूक प्राणियों की कुछ सेवा करे ? ये मूक और निर्दोष प्राणी अपनी आवश्यकता हमें शब्दों में नहीं बता सकते हैं । अतः जिस तरह हम अपनी भूख - प्यास को मिटाने के लिए सतत प्रयत्...

premsindhu me gotaa maar.... price- 8 Rs/-

Image
इस पुस्तक के कुछ अंश ... वास्तव में , वही धन्य है जिसके हृदय में प्रेमभाव उत्पन्न हो गया ! बिना रस के , जीवन सूखा , नीरस , मशीन-सा हो गया ! भगवत्प्रेम में स्वतंत्र सुख छुपा है - जब चाहो - जहाँ चाहो , कभी संयोग में , कभी वियोग में - वह प्रेम कभी कम नहीं होता - बल्कि बढ़ता ही जाता है | भगवान रसमय हैं , नित्य नूतन हैं , उनका ध्यान , स्मरण , चिन्तन , दर्शन आपके नीरस जीवन को रसमय - आनन्दमय बनाने की ताकत रखता है | "रसो वै स : |" ********** जीवन को प्रेम से परिपूण कीजिए ********** गरमी की लौ है द्वेष , परन्तु भगवद्प्रेम बसंत का समीर है | त्याग तो प्रेम की परीक्षा है और बलिदान प्रेम की कसौटी है | प्रेम आँखों से कम और मन से ज्यादा देखता है | सच्चे प्रेम में अपना आप खो जाता है | ********** x

meri kalam se... price-60 Rs/-

Image
                                                                      इस पुस्तक से कुछ अंश ... सृजनात्मक लेखन , सृजनात्मक रचना , सृजनात्मक निर्माण एक अलग अनोखी प्रक्रिया है | अधिकतर जितने भी सृजक हुए है दुनियाभर में वे गलतियाँ कर - करके सीखे है , आगे बढ़े है | सृजक किसी का स्वामी नहीं होता | वह मित्र होता है | सृजक की हर एक क्षण समाधी कि क्षण होती है | कुछ नया , हरदम – नित्य नवीन सृजित करते रहने का आनंद ही कुछ और है ! कभी दिन में – कभी रात्रि में , जब चाहे , अनायास कुछ नया सृजित करने में स्वयं को खो देना , निर्विकार , निरहंकार अवस्था में पहुँच जाना और परम शांत परमानंद में मग्न होकर कुछ लिखना – सृजन करना मानो हर क्षण समाधी का सूख देती है ! काश ! एकाध क्षण , यह पढ़ते – पढ़ते आपकी भी ऐसी घटित ...